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महाराणा सांगा || Maharana Sanga || Maharana Sangram singh

महाराणा संग्राम सिंह (महाराणा सांगा) (1509 – 1528 ई.) Maharana Sanga Maharana Sangram singh –  महाराणा सांगा 25 मई, 1509 ई. में मेवाड़ का शासक बना। –  राणा सांगा इतिहास में ‘हिन्दूपत’ के नाम से विख्यात है। – इसके शरीर पर 80 घाव होने के कारण कर्नल जेम्स टॉड ने सांगा को ‘सैनिक भग्नावशेष’ की संज्ञा दी। – सांगा ने श्रीनगर (अजमेर) के करमचंद पंवार की पुत्री जसोदा कंवर से विवाह किया था। –  कर्नल जेम्स टॉड के विवरण […]

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महाराणा रायमल || Maharana Raymal

महाराणा रायमल (1473 – 1509 ई.) || Maharana Raymal –  राणा रायमल का विवाह मारवाड़ के राव जोधा की पुत्री श्रृंगार देवी से हुआ। पृथ्वीराज, जयमल और सांगा उसके पुत्र थे। इसकी बेटी आनंदा बाई का विवाह सिरोही के जगमाल के साथ हुआ। – रायमल के पुत्र पृथ्वीराज का विवाह टोडा के राव सुरताण की पुत्री तारा के साथ हुआ। पृथ्वीराज ने तारा के नाम पर अजमेर के अजयमेरु दुर्ग का नाम ‘तारागढ़’ रखा। पृथ्वीराज को ‘उड़ना राजकुमार’ के नाम से भी जाना जाता है। –  रायमल के दरबार में गोपाल भट्ट, महेश भट्ट जैसे विद्वान तथा अर्जुन जैसे प्रकाण्ड शिल्पी का निवास था। –  रायमल ने चित्तौड़ में अद्भुतजी के मन्दिर का निर्माण करवाया था। इसने एकलिंग मन्दिर का वर्तमान स्वरूप बनवाया। –  रायमल की पत्नी श्रृंगार देवी ने घोसुण्डी की बावड़ी (चित्तौड़) का निर्माण करवाया था। – रायमल ने खेती को प्रोत्साहित करने के लिए राम, शंकर व समयासंकट नामक तालाबों का निर्माण करवाया था।

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महाराणा कुम्भा || Maharana Kumbha

महाराणा कुम्भा (1433 – 1468 ई.) Maharana Kumbha – महाराणा कुम्भा, मोकल व रानी सौभाग्यवती परमार का पुत्र था। –  महाराणा कुम्भा 1433 ई. में मेवाड़ का शासक बना था। रणमल इसके संरक्षक थे। –  कुम्भा ने मेवाड़ से राठौड़ों का प्रभाव समाप्त किया तथा चित्तौड़गढ़ एवं कुम्भलगढ़ को अपनी शक्ति का केन्द्र बनाया। –  कुम्भा की उपाधियों का उल्लेख ‘कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति’ में किया गया है।   महाराणा कुम्भा कीप्रमुख उपाधियाँ – – अभिनव भरताचार्य – संगीत का ज्ञान होने के कारण – परम भागवत तथा आदि वराह – विष्णु भक्त होने के कारण

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महाराणा मोकल || Maharana Mokal

महाराणा मोकल (1421 – 1433 ई.) || Maharana Mokal –  यह महाराणा लक्ष सिंह व हंसाबाई का पुत्र था। चूंडा इसका संरक्षक था। हंसाबाई के विश्वास के कारण चूंडा मेवाड़ छोड़कर मालवा चला गया। इस समय मालवा का सुल्तान होशंगशाह था। –  मोकल के प्रारंभिक शासन पर इनके मामा रणमल राठौड़ का प्रभाव था। –  इसके दरबार में योगेश्वर एवं भट्ट विष्णु जैसे विद्वान तथा फना, वसील एवं मना

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महाराणा लाखा या लक्ष सिंह || Maharana Lakha

महाराणा लाखा या लक्ष सिंह (1382 – 1421 ई.) || Maharana Lakha – यह हम्मीर का पौत्र व खेता का पुत्र था। – इसी के समय ‘जावर’ में जस्ते व चाँदी की खानों का पता लगाया गया। –  इसके काल में पिच्छू नामक चिड़ीमार बंजारे द्वारा ‘पिछोला झील’ (उदयपुर) का निर्माण करवाया गया। इसके नजदीक नटनी का चबूतरा बना हुआ है। – इसने मारवाड़ के राव चूंडा राठौड़ की पुत्री (रणमल की बहन) हंसा बाई से विवाह किया, जिससे ‘मोकल’ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई । – इसके ज्येष्ठ पुत्र कुंवर चूंडा को ‘मेवाड़ का भीष्म पितामह’ कहा जाता है। चूंडा के त्याग के कारण उसे कई विशेषाधिकार दिए गए थे। – इसके दरबार में झोटिंग भट्ट व धनेश्वर भट्ट नामक दो संगीतकार रहते थे। –  महाराणा लाखा के साथ बूँदी के नकली दुर्ग की कथा जुड़ी हुई है, जिसकी रक्षा हेतु कुम्भा हाड़ा (राणा लाखा का साला) ने अपने प्राणों का बलिदान किया था। –  इस समय सेना की अग्रिम टुकड़ी

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महाराणा खेता या क्षेत्र सिंह || Maharan kheta / Kshetra singh

महाराणा खेता या क्षेत्र सिंह (1364 – 1382 ई.) || Maharan kheta / Kshetra singh – क्षेत्र सिंह ने मालवा के शासक दिलावर खाँ गौरी को पराजित किया था। –  इन्ही के काल से ‘मेवाड़ – मालवा संघर्ष’ का आरंभ माना जाता है। – क्षेत्र सिंह ने अजमेर, जहाजपुर, माण्डल तथा छप्पन के क्षेत्रों को अपने राज्य मे मिला लिया था। इसने बूंदी के हाड़ाओं को पराजित कर बूंदी को अपने अधीन किया।

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राणा हम्मीर || Rana hammir

राणा हम्मीर (1326 – 1364 ई.) || Rana hammir – राणा हम्मीर सिसोदा गाँव का निवासी था। –  उसके पिता अरि सिंह और दादा लक्ष्मण सिंह थे। – यह राणा शाखा अथवा सिसोदिया शाखा का प्रथम शासक था। इसने राणा की उपाधि धारण की। –  सिसोदा ठिकाने के जागीरदार हम्मीर ने 1326 ई. में सोनगरा को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया तथा गुहिल वंश की पुन: स्थापना की। –  सिसोदा का जागीरदार होने के कारण इनको सिसोदिया कहा गया है तथा गुहिल वंश सिसोदिया वंश के नाम से जाना जाने लगा। –  हम्मीर राणा शाखा का राजपूत था, इसलिए इसके बाद मेवाड़ के सभी शासक राणा/महाराणा कहलाए। –  हम्मीर को ‘मेवाड़ का उद्धारक’भी कहा जाता है । –  इसे ‘रसिक प्रिया’ नामक पुस्तक में ‘वीर राजा’ तथा कुंभलगढ़ प्रशस्ति में ‘विषमघाटी पंचानन’

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रावल रतन सिंह || Ratan singh

रतन सिंह (1302 – 1303 ई.) || Ratan singh – रतन सिंह ने सिंहल द्वीप (श्रीलंका) के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की पुत्री पद्मिनी से विवाह किया। – पद्मिनी का प्रिय तोता ‘हीरामन’ था। –  इनके बारे में जानकारी का प्रमुख स्रोत 1540 ई. की मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा मसनवी शैली में रचित अवधी भाषा का प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘पद्मावत’ है। इस ग्रंथ में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण का कारण पद्मिनी को प्राप्त करना बताया गया है। –  ‘पद्मावत’

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समर सिंह || Samar singh

समर सिंह (1273 – 1302 ई.) || Samar singh –  इसका काल विद्या की उन्नति के लिए जाना जाता है। इसके राज्य में रत्नप्रभसूरी, पार्श्वचन्द, भावशंकर, वेदशर्मा, शुभचन्द आदि विद्वान तथा पद्म सिंह, केल सिंह, केल्हण आदि शिल्पी निवास करते थे। –  समर सिंह ने मेवाड़ में जीव हिंसा पर रोक लगाई । – ‘चीरवा अभिलेख’ में शत्रु संहार के कारण समर सिंह को ‘सिंह के समान’ माना गया है। – ‘कुम्भलगढ़ प्रशस्ति’ में इसे ‘शत्रुओं की शक्ति का अपहरणकर्ता’ बताया गया है। –  उसके एक पुत्र कुंभकरण ने ’नेपाल में गुहिल वंश की स्थापना’ की।

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तेज सिंह || Tej singh

तेज सिंह (1250 – 1273 ई.) || Tej singh   तेज सिंह के काल में मेवाड़ चित्रशैली की शुरुआत हुई। तेज सिंह के समय 1260 ई. में कमलचंद्र द्वारा ‘श्रावक प्रतिक्रमणसूत्रचूर्णी’ नामक मेवाड़ के प्रथम चित्रित ग्रंथ की रचना की गई। तेज सिंह के काल में ‘बलबन’ का मेवाड़ पर आक्रमण हुआ जो असफल रहा। तेज सिंह की रानी जयतल्ल देवी ने चित्तौड़ में श्यामा

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