psychology

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वैयक्तिक विभिन्नताएँ एवं विशिष्ट बालक || Individual Difference and Exceptional

● कोई भी दो बालक/व्यक्ति समान नहीं होते हैं अर्थात् सभी में शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक, बौद्धिक रूप से विभिन्नताएँ पाई जाती हैं, जिसे व्यक्तिगत विभिन्नता कहते हैं।● प्रत्येक बालक विशिष्ट होता है। समाज में सभी बालक एक समान प्रकृति के नहीं होते हैं और उन बालकों में विभिन्न प्रकार की अलग-अलग विशेषताएँ होती हैं।● […]

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नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 || Right to Free and Compulsory Education Act, 2009

नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009(Right to Free and Compulsory Education Act, 2009) ● भारत में स्कूली शिक्षा को अनिवार्य किए जाने की माँग सबसे पहले गोपाल कृष्ण गोखले ने ‘गोखले बिल’ 18 मार्च, 1910 में की थी। भारत में शिक्षा के अधिकार (RTE) का जन्मदाता गोपाल कृष्ण गोखले को माना जाता है।

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क्रियात्मक अनुसंधान || Action Research

क्रियात्मक अनुसंधान, शिक्षा जगत में व्यावहारिक एवं निदानात्मक अनुसंधान का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। दैनिक जीवन में उत्पन्न शैक्षिक समस्याओं के समाधान के लिए क्रियात्मक अनुसंधान का सहारा लिया जाता है।क्रियात्मक अनुसंधान का सूत्रपात करने का श्रेय अमेरिका को दिया जाता है। क्रियात्मक अनुसंधान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कोलियर द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के समय

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उपलब्धि/निष्पत्ति परीक्षण || Achievement Test

उपलब्धि/निष्पत्ति परीक्षण (Achievement Test) व्यक्ति अपने जीवन में अनेक प्रकार का ज्ञान तथा कौशल प्राप्त करता है। इस ज्ञान तथा कौशल में कितनी दक्षता व्यक्ति ने प्राप्त की है, इसका पता उपलब्धि परीक्षण से चलता है।● उपलब्धि परीक्षण द्वारा किसी विशेष कार्य क्षेत्र में छात्रों द्वारा अर्जित किए गए ज्ञान एवं कौशल को मापा जाता

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सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) || Continuous and Comprehensive Evaluation

शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने की दिशा में आकलन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है और यह विभिन्न पणधारकों (Stakeholders) की कई प्रकार से सहायता करता है। यह पता लगाकर कि बच्चे कितना सीख रहे हैं, CCE विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों, प्रशिक्षकों, नीति-निर्माताओं आदि को विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। यह विद्यालय या कक्षा स्तर पर पाठ्यचर्या, शिक्षण शास्त्र और शिक्षक की भूमिकाओं को सक्रिय करता एवं जोड़ता है। यह कथागत प्रक्रियाओं को इस प्रकार प्रभावित करता है कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में गुणात्मक सुधार आएँ जिससे प्रत्येक बच्चे को समग्र रूप से सीखने और विकसित होने के पर्याप्त अवसर मिल सकें। “ज्ञान विस्फोट” के इस युग में और “ज्ञान-प्रधान समाज” की निरंतर बदलती आवश्यकताओं के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए, यह आवश्यक है कि वे कौशल प्राप्त किए जाएं जो ‘सीखना’ सिखा सकें। आकलन की प्रक्रिया ऐसी हो जो उच्च कोटि चिंतन के कौशलों को विकसित कर सके। साथ ही आकलन, दिव्यांगताओं, पूर्वाग्रहों व पूर्व-निर्मित धारणाओं से जुड़ी अपनी समस्याओं को सुलझाने का एक प्रभावी साधन है।● आकलन बच्चों की जन्मजात क्षमताओं पर आधारित होना चाहिए।● विद्यालय आधारित आकलन, सीखने की प्रक्रिया को निरंतर बढ़ाते हुए बच्चों को न केवल प्रगति की ओर अग्रसर करता है, अपितु बाहरी परीक्षा के भय को भी दूर करता है। इस संदर्भ में, अप्रैल 2010 से लागू RTE अधिनियम-2009 के अनुसार सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन को एक विद्यालय-आधारित मूल्यांकन प्रणाली के रूप में शुरू किया गया। इस अधिनियम के अनुसार CCE को प्रारम्भिक स्तर तक लागू किया जाना अनिवार्य है। बाहरी परीक्षा की प्रधानता को कम करने के लिए यह अधिनियम प्रत्येक पणधारक विशेषकर शिक्षकों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसलिए यह जरूरी है कि शिक्षक न केवल इसकी सार्थकता को समझे बल्कि हर बच्चे के सम्पूर्ण विकास में इसका भरपूर उपयोग भी करे।● भारत सरकार द्वारा स्थापित शिक्षा आयोग (1964-66) के परीक्षा सुधारों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 के अनुसार बच्चों के सीखने की प्रगति का आकलन, शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। इसमें उल्लेख किया गया है कि CCE को शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया में इस प्रकार लागू किया जाए जिससे शैक्षिक एवं गैर शैक्षिक पहलुओं को समग्र रूप से देखते हुए स्कूली व्यवस्था में अंकों के स्थान पर ग्रेड द्वारा आकलन करने पर बल दिया जाए। इसमें बाहरी परीक्षा की प्रधानता को कम करने पर तथा स्कूली स्तर पर मूल्यांकन को सरल और कारगर बनाने के लिए कहा गया है।● सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन के ‘सतत्’ से आशय सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के दौरान चलने वाले आकलन से है, जो सत्र के अंत में होने वाले आकलन के साथ-साथ समय रहते यह संकेत दे देता है कि शिक्षण में और सीखने में कहाँ-कहाँ सुधार की जरूरत है। विशिष्ट पाठ्यचर्या के क्षेत्रों के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों को शामिल करते हुए बच्चे के समग्र विकास को ध्यान में रखने को व्यापकता के रूप में देखा जाता है।● CCE की अनुशंसा इसलिए की गई थी कि सीखने की आवश्यकताओं को समझने में आ रही कठिनाइयों की पहचान की प्रक्रिया में संवर्द्धन करने और चिंता एवं तनाव दूर करने में समय रहते समुचित उपाय करने में मदद मिलेगी। इसका यह भी उद्देश्य है कि रटने की प्रवृत्ति को कम किया जाए, शिक्षकों द्वारा अपने शिक्षण पर विचार-विमर्श किया जाए, उसकी समीक्षा की जाए और सुधार किया जाए। सभी बच्चों को उनके सीखने में सुधार के लिए फीडबैक दिया जाए। यह व्यवस्था विशेष आवश्यकता वाले और वंचित वर्गों से संबंध रखने वाले बच्चों के लिए भी लागू है। हालाँकि इस व्यवस्था को संदर्भ के अनुरूप विभिन्न साधनों के द्वारा और अधिक विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है।● अधिगम और आकलन की प्रक्रिया एक-दूसरे से जुड़ी है, उन्हें अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता है। सीखने की प्रकृति(i) सीखना एक सतत् प्रक्रिया है।(ii) सीखना चक्रीय (Spiral) होता है, रैखिक नहीं।(iii) सीखने की समग्र प्रकृति

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आकलन || Assesment

● यह मूल्यांकन का ही भाग होता है। जिसका सामान्य अर्थ- सूचनाओं को एकत्रित करने की प्रक्रिया से है।● सीखने-सीखाने की प्रक्रिया के दौरान ही बच्चों के सीखने में रह गई कमियों को पहचानने की प्रक्रिया है।● सीखने-सीखाने के दौरान ही आकलन के लिए विभिन्न कार्यनीतियों का उपयोग करते हुए साक्ष्य इकट्‌ठे किए जाते हैं।

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राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF)-2005 || National Curriculum Framework (NCF)

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF)-2005[National Curriculum Framework (NCF)- ● राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् की कार्यकारिणी ने 14 एवं 19 जुलाई, 2004 की बैठकों में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या को संशोधित करने का निर्णय लिया।● 1993 की ‘शिक्षा बिना बोझ के’ रपट की रोशनी में विद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्ययर्चा की रूपरेखा (एन.सी.एफ.एस.ई.), 2000 की समीक्षा करने की आवश्यकता व्यक्त की। इन्हीं निर्णयों के संदर्भ में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय संचालन समिति और 21 राष्ट्रीय फोकस समूहों का गठन किया गया।● मैसूर, अजमेर, भुवनेश्वर, भोपाल और शिलॉन्ग में स्थित परिषद् के क्षेत्रीय शिक्षा संस्थानों में भी क्षेत्रीय संगोष्ठियों का आयोजन किया गया।● संशोधित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या दस्तावेज का आरंभ रवीन्द्रनाथ टैगोर के निबंध ‘सभ्यता और प्रगति’ के एक उद्धरण से होता है जिसमें कविगुरु हमें याद दिलाते हैं कि सृजनात्मकता और उदार आनंद बचपन की कुंजी है और नासमझ वयस्क संसार द्वारा उनकी विकृति का खतरा है।● राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एन.पी.ई.), 1986 में यह प्रस्तावित किया गया था कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या को शिक्षा की राष्ट्रीय व्यवस्था विकसित करने का एक साधन होना चाहिए जो भारतीय संविधान में राष्ट्रीय निर्माण के दर्शन को अपनी आधार भूमि माने। कार्ययोजना (पी.ओ.ए.) 1992 ने प्रासंगिकता, लचीलेपन और गुणवत्ता के तत्त्वों पर जोर देते हुए इसके दायरे को थोड़ा और विस्तृत किया।● राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2005 में कुल 5 अध्याय है जो निम्न प्रकार है–1. परिप्रेक्ष्य2. सीखना और ज्ञान3. पाठ्यचर्या के क्षेत्र, स्कूल की अवस्थाएँ और आकलन4. विद्यालय एवं कक्षा का वातावरण5. व्यवस्थागत सुधार ● पाठ्यचर्या निर्माण के 5 सिद्धांत :-1. ज्ञान को स्कूल के बाहर के जीवन से जोड़ना।2.

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सीखने के प्रतिफल || Learning Outcomes

● ‘सीखने के प्रतिफल’ दस्तावेज राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) द्वारा राज्य एवं जिला स्तर के हितधारकों के साथ मिलकर तैयार किया गया और शैक्षिक सत्र 2017-18 से कक्षा 1 से 8 तक (प्रारम्भिक स्तर) के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम,  2009 (RTE-2009) के सरोकार को संबोधित करने के लिए इसे क्रियान्वित किया गया।

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शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, शिक्षण अधिगम की व्यूह रचना एवं विधियाँ || Teaching-Learning Process, Tactics and Methods of Teaching-Learning

शिक्षण (Teaching)● शिक्षण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बालक के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाया जाता है।● शिक्षण वह प्रक्रिया है जिसमें क्रियाओं की संरचना व निष्पादन विद्यार्थी के व्यवहार में परिवर्तन के लिए किया जाता है। परिभाषा :-B.O. स्मिथ :- शिक्षण क्रियाओं की एक विधि है जो सीखने की उत्सुकता जाग्रत करती है। स्कीनर :- शिक्षण पुनर्बलन

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बुद्धि || Intelligence ||

● बुद्धि मनुष्य की वह विलक्षण क्षमता है जिसके कारण वह अन्य प्राणियों में सबसे श्रेष्ठ है। बुद्धि के बल पर ही एक व्यक्ति उन कार्यों को कर पाता है जिनके बारे में सोचने मात्र से हैरानी हो जाती है और एक व्यक्ति इसके बल को लेकर अंदाजा नहीं लगा पाता।● शेर जैसे खूंखार प्राणी

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