History of Mewar

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now

प्रतापगढ़ का गुहिल वंश || Pratapgargh ka guhil vansh

प्रतापगढ़ का गुहिल वंश –  प्रतापगढ़ में गुहिल वंश का प्रारम्भ महाराणा मोकल के द्वितीय पुत्र क्षेम सिंह से प्रारम्भ हुआ। –  प्रतापगढ़ के शासक महारावत कहलाए। ये सूर्यवंशी राजा थे। –  क्षेम सिंह ने 1437 ई. में सादड़ी पर अधिकार किया था। –  क्षेम सिंह मालवा की सेना के साथ मेवाड़ के विरुद्ध लड़ा था । –  बाघ सिंह ने चित्तौड़ पर मालवा के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के समय चितौड़गढ़ दुर्ग की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। –  विक्रम सिंह ने देवलिया को अपनी राजधानी बनाया। –  महारावत हरि सिंह ने 1633 ई. में शाहजहाँ के समय मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। –  महारावत रघुनाथ सिंह को ब्रिटिश सरकार ने ‘नाइट […]

प्रतापगढ़ का गुहिल वंश || Pratapgargh ka guhil vansh Read More »

बांसवाड़ा का गुहिल वंश || Banswada ka guhil vansh

 बांसवाड़ा का गुहिल वंश –  वागड़ के शासक उदय सिंह ने अपने राज्य को दो भागों में बाँटा था। –  माही नदी के पूर्व का भाग बांसवाड़ा कहलाया और जगमाल यहाँ का प्रथम शासक बना। –  महारावल जगमाल ने लगभग 1530 ई. में बांसवाड़ा में गुहिल वंश की नींव रखी। –  महारावल जगमाल ने बांसवाड़ा में भीलेश्वर महादेव मन्दिर व फूल महल का निर्माण करवाया। –  महारावल जगमाल की पत्नी लाछकुंवरी ने तेजपुर गाँव में ‘बाई का तालाब’ निर्मित करवाया। –  11 वीं शताब्दी में यहाँ परमारों का शासन था, जिसकी राजधानी आर्थुणा थी। –  प्रताप सिंह ने 1576 ई. में मुगल शासक अकबर की अधीनता स्वीकार की। डूंगरपुर के आसकरण ने भी अकबर की अधीनता स्वीकार की थी। – 

बांसवाड़ा का गुहिल वंश || Banswada ka guhil vansh Read More »

वागड़ में गुहिल राजवंश || Vagad me Guhil Rajvansh

वागड़ में गुहिल राजवंश –  राजस्थान का दक्षिणी भाग, जिसमें बांसवाड़ा, डूंगरपुर व प्रतापगढ़ का कुछ भाग शामिल है, वागड़ क्षेत्र कहलाता है। –  जालोर के चौहान शासक कीर्तिपाल से पराजित होकर मेवाड़ के शासक सामंत सिंह ने वागड़ क्षेत्र (1178 ई.) में गुहिल वंश की नींव रखी। –  सामंत सिंह ने वद्रपटक (बड़ौदा) को अपनी राजधानी बनाया था। –  गुजरात के सोलंकी वंश के शासक भीमदेव द्वितीय ने सामंत सिंह को पराजित कर वागड़ क्षेत्र, गुहिल वंशीय विजयपाल को दे दिया। –  तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में सामंत सिंह के वंशज जयन्त सिंह ने वागड़ पर पुन: अधिकार कर लिया। –  देवपाल के उत्तराधिकारी वीर सिंह ने डूँगरिया भील को पराजित कर डूंगरपुर की स्थापना की एवं इसे अपनी राजधानी बनाया। प्रताप सिंह (1398 – 1424 ई.) – –  यह पाता रावल के नाम से विख्यात था। –  प्रताप सिंह ने पोतला तालाब व पोतला द्वार का निर्माण करवाया था। –  प्रताप सिंह ने प्रतापपुर नगर बसाया था। गोपीनाथ (1424 – 1447 ई.)

वागड़ में गुहिल राजवंश || Vagad me Guhil Rajvansh Read More »

राणा भूपाल / भोपालसिंह (1930 -1947 ई.) || Rana Bhupal Singh

राणा भूपाल / भोपालसिंह (1930 -1947 ई.) Rana Bhupal Singh –  भूपाल सिंह, सिसोदिया वंश का अंतिम शासक था। –  इनके समय राजस्थान का एकीकरण हुआ था। –  इनके समय में बिजोलिया, बेंगू किसान आन्दोलन तथा प्रजामण्डल आन्दोलन हुआ। –  18 अप्रैल, 1948 को उदयपुर रियासत का विलय संयुक्त राजस्थान में हो गया। –  राजस्थान के ये एकमात्र शासक थे, जो आजीवन ‘महाराज प्रमुख’ पद पर रहे। –  ये स्वतंत्रता के समय मेवाड़ के शासक थे।

राणा भूपाल / भोपालसिंह (1930 -1947 ई.) || Rana Bhupal Singh Read More »

महाराणा फतेह सिंह (1884 – 1930 ई.) || Maharana Fateh Singh

महाराणा फतेह सिंह (1884 – 1930 ई.) Maharana Fateh Singh –  महाराणा फतेह सिंह शिवरती के महाराजा दलसिंह के पुत्र थे। –  उन्होंने राजपूतों में बहुविवाह, बालविवाह एवं फिजूलखर्ची पर रोक लगाई। –  ब्रिटेन के राजकुमार केनॉट ऑर्थर विलियम पैट्रिक के मेवाड़ आगमन पर उन्होंने देवली में राजकुमार के हाथ से केनॉट (फतहसागर) बाँध की नींव रखवाई। –  इन्होंने फतहसागर झील का निर्माण करवाया। –  इनके काल में बिजोलिया किसान आंदोलन प्रारंभ हुआ था। –  ऑर्डर ऑफ क्राउन ऑफ इंडिया इनकी उपाधि थी। –  1889 में ए.जी.जी. में वॉल्टर ने राजपूत हितकारिणी सभा की स्थापना की। –  वर्ष 1903 में फतेह सिंह, एडवर्ड सप्तम के दरबार में शामिल होने जा रहे थे, तो केसरी सिंह बारहठ ने ‘चेतावनी रा चूंगट्या’ नामक 13 सोरठे लिखकर इन्हें दिए थे। इससे प्रभावित होकर ये दरबार में शरीक नहीं हुए।

महाराणा फतेह सिंह (1884 – 1930 ई.) || Maharana Fateh Singh Read More »

राणा सज्जन सिंह (1874 – 1884 ई.) || Rana Sajjan Singh

राणा सज्जन सिंह (1874 – 1884 ई.) Rana Sajjan Singh –  महाराणा सज्जन सिंह बागौर ठिकाने के शक्तिसिंह के पुत्र थे। –  इन्होंने 14 फरवरी, 1878 को अंग्रेजों के साथ नमक समझौता किया था। इनके समय में वायसराय लॉर्ड नॉर्थब्रुक उदयपुर आए। –  इनके समय 1881 ई. में लॉर्ड रिपन चित्तौड़गढ़ आए तथा महाराणा को (Grand Commander of the Star of India) जी.सी.एस.आई. का खिताब दिया। –  इन्होंने ‘सज्जन निवास’ नाम से सुन्दर बाग लगवाया। –  इनके राज्य में शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए एजुकेशन कमेटी की स्थापना की गई थी। –  महाराणा ने अपने नाम से ‘सज्जन अस्पताल’ एवं कर्नल वॉल्टर के नाम से ‘वॉल्टर जनाना अस्पताल’ का निर्माण करवाया था। –  इनके समय मेवाड़ में जमीन की पैमाइश करवाकर नया भू-राजस्व बंदोबस्त शुरू किया

राणा सज्जन सिंह (1874 – 1884 ई.) || Rana Sajjan Singh Read More »

राणा शंभू सिंह (1861 – 1874 ई.) || Rana Shambhu Singh

राणा शंभू सिंह (1861 – 1874 ई.) Rana Shambhu Singh –  महाराणा शंभू सिंह को बागौर ठिकाने से गोद लिया गया था। –  इनके राज्याभिषेक के समय यह नाबालिग थे, इसलिए राज्य प्रबन्ध के लिए पॉलिटिकल एजेन्ट मेजर टेलर की अध्यक्षता में रीजेंसी कौंसिल (पंच सरदारी) की स्थापना की गई थी। –  इनके समय मेवाड़ में नई अदालतों की स्थापना के विरोध में नगर सेठ चम्पालाल के नेतृत्व में उदयपुर में हड़ताल (1864 ई.) हुई थी। –  इनके समय उदयपुर में शंभूरत्न पाठशाला 1863 ई.  में स्थापित की गई थी। इनके समय शंभू पलटन नाम से नई सेना का गठन किया गया। –  शंभू सिंह के काल में श्यामलदास ने वीर विनोद का लेखन प्रारम्भ किया। –  इनके समय सती प्रथा, दास प्रथा तथा बच्चों के क्रय-विक्रय पर कठोर प्रतिबन्ध लगाए गए। –  शंभू सिंह मेवाड़

राणा शंभू सिंह (1861 – 1874 ई.) || Rana Shambhu Singh Read More »

महाराणा स्वरूप सिंह (1842 – 1861ई.) || Maharana Swaroop Singh

महाराणा स्वरूप सिंह (1842 – 1861ई.) Maharana Swaroop Singh –  महाराणा स्वरूपसिंह सरदार सिंह का छोटा भाई था। –  स्वरूप सिंह 1857 ई. की क्रांति में अंग्रेजों का साथ देने वाला राजपूताना का पहला शासक था। –  इन्होंने मेवाड़ में जाली सिक्कों के प्रचलन को समाप्त करने के लिए  स्वरूपशाही सिक्के चलाये जिन पर ‘चित्रकूट उदयपुर’ व दूसरी ओर ‘दोस्ती लंदन’ अंकित था। –  स्वरूप सिंह ने विजय स्तम्भ का जीर्णोद्धार करवाया। –  महाराणा स्वरूपसिंह ने कन्या वध पर 1844 ई. में तथा सती प्रथा पर 1861 ई. में रोक लगाई। –  इन्होंने डाकन प्रथा (1853 ई.) व समाधि प्रथा पर भी रोक लगाई थी। –  स्वरूप सिंह की मृत्यु 1861 ई. में हुई तथा इनके साथ पासवान ऐंजाबाई सती हुई थी, जो मेवाड़ राज परिवार में सती होने की अन्तिम घटना थी।

महाराणा स्वरूप सिंह (1842 – 1861ई.) || Maharana Swaroop Singh Read More »

महाराणा सरदार सिंह (1838 – 1842 ई.) || Maharana Saradar Singh

महाराणा सरदार सिंह (1838 – 1842 ई.) Maharana Saradar Singh –  सरदार सिंह बागौर ठिकाने से गोद लिए गए थे। –  इन्होंने जनजातीय उपद्रवों को नियंत्रित करने हेतु 1841 ई. में मेवाड़ भील कोर का गठन किया। इसका मुख्यालय खैरवाड़ा (उदयपुर) में स्थापित किया गया। इसका राजस्थान पुलिस विभाग में 1950 ई. में विलय कर दिया गया।

महाराणा सरदार सिंह (1838 – 1842 ई.) || Maharana Saradar Singh Read More »

महाराणा भीम सिंह (1778 – 1828 ई.) || Maharana Bhim singh

महाराणा भीम सिंह (1778 – 1828 ई.) Maharana Bhim singh –  भीम सिंह ने 13 जनवरी, 1818 ई. को मराठों के भय से अंग्रेजों से संधि कर ली थी। इस संधि पर मेवाड़ की ओर से ठाकुर अजीत सिंह (आसींद, भीलवाड़ा) तथा अंग्रेजों की ओर से चार्ल्स मैटकॉफ ने हस्ताक्षर किए थे। –  भीम सिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी से विवाह के लिए मार्च, 1807 ई.  में जोधपुर के महाराजा मान सिंह एवं जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय के बीच गिंगोली (परबतसर, नागौर) का युद्ध हुआ। इसमें जयसिंह द्वितीय की जीत हुई। –  अमीर खाँ पिण्डारी व अजीत सिंह चुंडावत के सलाह पर कृष्णा कुमारी को जहर दे दिया गया। –  इनके समय फरवरी, 1818

महाराणा भीम सिंह (1778 – 1828 ई.) || Maharana Bhim singh Read More »

You cannot copy content of this page