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राष्ट्रपति : भारत का संविधान

राष्ट्रपति राष्ट्रपति (President) राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक प्रधान होता है। यह राष्ट्राध्यक्ष है, किन्तु सरकार का अध्यक्ष नहीं। सरकार का अध्यक्ष प्रधानमंत्री है। राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका का नाममात्र का प्रधान है। शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामलें में उच्चतम न्यायालय का मत है कि ‘राष्ट्रपति मात्र संवैधानिक या औपचारिक प्रधान है।’ यह देश […]

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संघवाद : भारत का संविधान

संघवाद –     भारतीय संविधान के अनुच्छेद-I में कहा गया है कि ‘भारत, राज्यों का संघ होगा।’ (Union of the states) –     अनुच्छेद-I में संघ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि ‘यूनियन’ शब्द का प्रयोग किया गया है। –     भारतीय संविधान की 7वीं अनुसूची में शक्तियों का विभाजन किया गया था तथा इसके अंतर्गत

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राष्ट्रीय एकीकरण : भारत का संविधान

राष्ट्रीय एकीकरण –     राष्ट्रीय एकीकरण राष्ट्र के अस्तित्व का आधार है। राष्ट्रीय एकीकारण क्या है, इसे समझने के लिए राष्ट्र क्या है, यह समझना आवश्यक है। राष्ट्र, राज्य का पर्यायवाची नहीं है। राष्ट्र एक निश्चित जाति भी नहीं है। मौटे तौर पर राष्ट्र किसी निश्चित भू-भाग में निवास करने वाले, भौगोलिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक इकाई

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गठबंधन सरकार : भारत का संविधान

गठबंधन सरकार –     भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है । यहाँ प्रत्येक पाँच वर्ष की अवधि के बाद लोकसभा और विधानसभा चुनाव होते हैं । इन चुनावों के माध्यम से जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है, जो केन्द्र और राज्य स्तर पर सरकार का गठन करते हैं, चूँकि भारतीय लोकतन्त्र में बहुदलीय व्यवस्था का

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भारत में लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ : भारत का संविधान

भारत में लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ – 1. जातिवाद एवं साम्प्रदायिकता       जातिवाद – जाति एक सामाजिक संरचना है जो अति प्राचीन काल से ही भारत में प्रचलित है।       भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका – भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। जयप्रकाश नारायण के अनुसार “जाति भारत में एक अत्यधिक महत्वपूर्ण दल

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग : भारत का संविधान

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पृष्ठभूमि – –     मानवाधिकार वो अधिकार है जो प्राकृतिक रूप से मानव को जन्म लेते ही प्राप्त होता है अर्थात् ऐसे अधिकार जो हर व्यक्ति को मानव होने के नाते प्राप्त होते हैं उसे हम मानव अधिकार कहते हैं जैसे- राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक अधिकार (भोजन, वस्त्र, आवास)।       नोट:-  मानवाधिकारों के जनक – प्रोफेसर हेनकीन

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लोकपाल : भारत का संविधान

लोकपाल –     भारत में स्वच्छ तथा पारदर्शी प्रशासन एवं भ्रष्टाचार रहित प्रशासन उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र में लोकपाल एवं राज्यों में लोकायुक्त पद का गठन किया गया है। –     लोकपाल, स्वीडिश शब्द ‘औम्बुड̖समैन’ का पर्याय है, जिसका का अर्थ है- “ऐसी संस्था जो कुशासन से नागरिकों की रक्षा करती है।“  औम्बुड̖समैन की सर्वप्रथम नियुक्ति 1809 में स्वीडन में की गई थी। –     भारत में संवैधानिक औम्बुड्समैन का विचार सर्वप्रथम वर्ष 1960 के दशक की शुरुआत में कानून मंत्री अशोक कुमार सैन ने संसद

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केन्द्रीय सूचना आयोग : भारत का संविधान

केन्द्रीय सूचना आयोग पृष्ठभूमि- –     केंद्रीय सूचना आयोग शासन की प्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो लोकतंत्र के लिए जरूरी है। –     केन्द्रीय सूचना आयोग एक उच्च प्राधिकारयुक्त स्वतंत्र निकाय है, जो इसमें दर्ज शिकायतों की जाँच करता है एवं उनका निराकरण करता है। –     यह केन्द्र सरकार

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केन्द्रीय सर्तकता आयोग : भारत का संविधान

केन्द्रीय सर्तकता आयोग –     केन्द्रीय सतर्कता आयोग केन्द्र सरकार, में भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक प्रमुख संस्था है। इसका सन् 1964 में केन्द्र सरकार द्वारा पारित एक प्रस्ताव के अंतर्गत गठन हुआ था। –     यह आयोग भ्रष्टाचार को रोकने पर बनाई गई “के. संथानम समिति” की सिफारिश पर गठित हुआ था। सितंबर, 2003 में संसद द्वारा

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नीति आयोग : भारत का संविधान

नीति आयोग पृष्ठभूमि – –     आजादी के बाद हमारे देश ने सोवियत संघ के समाजवादी शासन की संरचना को अपनाया, जिसमें योजनाएँ (पंचवर्षीय तथा एकवर्षीय योजनाएँ) बनाकर काम किया जाता था। –     इन योजनाओं को लागू करने के लिए योजना आयोग का गठन किया गया था, मगर वर्तमान समय की जरूरतों को देखते हुये योजना आयोग निष्क्रिय हो

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