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महाराणा फतेह सिंह (1884 – 1930 ई.) || Maharana Fateh Singh

महाराणा फतेह सिंह (1884 – 1930 ई.) Maharana Fateh Singh –  महाराणा फतेह सिंह शिवरती के महाराजा दलसिंह के पुत्र थे। –  उन्होंने राजपूतों में बहुविवाह, बालविवाह एवं फिजूलखर्ची पर रोक लगाई। –  ब्रिटेन के राजकुमार केनॉट ऑर्थर विलियम पैट्रिक के मेवाड़ आगमन पर उन्होंने देवली में राजकुमार के हाथ से केनॉट (फतहसागर) बाँध की नींव रखवाई। –  इन्होंने फतहसागर झील का निर्माण करवाया। –  इनके काल में बिजोलिया किसान आंदोलन प्रारंभ हुआ था। –  ऑर्डर ऑफ क्राउन ऑफ इंडिया इनकी उपाधि थी। –  1889 में ए.जी.जी. में वॉल्टर ने राजपूत हितकारिणी सभा की स्थापना की। –  वर्ष 1903 में फतेह सिंह, एडवर्ड सप्तम के दरबार में शामिल होने जा रहे थे, तो केसरी सिंह बारहठ ने ‘चेतावनी रा चूंगट्या’ नामक 13 सोरठे लिखकर इन्हें दिए थे। इससे प्रभावित होकर ये दरबार में शरीक नहीं हुए।

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राणा सज्जन सिंह (1874 – 1884 ई.) || Rana Sajjan Singh

राणा सज्जन सिंह (1874 – 1884 ई.) Rana Sajjan Singh –  महाराणा सज्जन सिंह बागौर ठिकाने के शक्तिसिंह के पुत्र थे। –  इन्होंने 14 फरवरी, 1878 को अंग्रेजों के साथ नमक समझौता किया था। इनके समय में वायसराय लॉर्ड नॉर्थब्रुक उदयपुर आए। –  इनके समय 1881 ई. में लॉर्ड रिपन चित्तौड़गढ़ आए तथा महाराणा को (Grand Commander of the Star of India) जी.सी.एस.आई. का खिताब दिया। –  इन्होंने ‘सज्जन निवास’ नाम से सुन्दर बाग लगवाया। –  इनके राज्य में शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए एजुकेशन कमेटी की स्थापना की गई थी। –  महाराणा ने अपने नाम से ‘सज्जन अस्पताल’ एवं कर्नल वॉल्टर के नाम से ‘वॉल्टर जनाना अस्पताल’ का निर्माण करवाया था। –  इनके समय मेवाड़ में जमीन की पैमाइश करवाकर नया भू-राजस्व बंदोबस्त शुरू किया

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राणा शंभू सिंह (1861 – 1874 ई.) || Rana Shambhu Singh

राणा शंभू सिंह (1861 – 1874 ई.) Rana Shambhu Singh –  महाराणा शंभू सिंह को बागौर ठिकाने से गोद लिया गया था। –  इनके राज्याभिषेक के समय यह नाबालिग थे, इसलिए राज्य प्रबन्ध के लिए पॉलिटिकल एजेन्ट मेजर टेलर की अध्यक्षता में रीजेंसी कौंसिल (पंच सरदारी) की स्थापना की गई थी। –  इनके समय मेवाड़ में नई अदालतों की स्थापना के विरोध में नगर सेठ चम्पालाल के नेतृत्व में उदयपुर में हड़ताल (1864 ई.) हुई थी। –  इनके समय उदयपुर में शंभूरत्न पाठशाला 1863 ई.  में स्थापित की गई थी। इनके समय शंभू पलटन नाम से नई सेना का गठन किया गया। –  शंभू सिंह के काल में श्यामलदास ने वीर विनोद का लेखन प्रारम्भ किया। –  इनके समय सती प्रथा, दास प्रथा तथा बच्चों के क्रय-विक्रय पर कठोर प्रतिबन्ध लगाए गए। –  शंभू सिंह मेवाड़

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महाराणा स्वरूप सिंह (1842 – 1861ई.) || Maharana Swaroop Singh

महाराणा स्वरूप सिंह (1842 – 1861ई.) Maharana Swaroop Singh –  महाराणा स्वरूपसिंह सरदार सिंह का छोटा भाई था। –  स्वरूप सिंह 1857 ई. की क्रांति में अंग्रेजों का साथ देने वाला राजपूताना का पहला शासक था। –  इन्होंने मेवाड़ में जाली सिक्कों के प्रचलन को समाप्त करने के लिए  स्वरूपशाही सिक्के चलाये जिन पर ‘चित्रकूट उदयपुर’ व दूसरी ओर ‘दोस्ती लंदन’ अंकित था। –  स्वरूप सिंह ने विजय स्तम्भ का जीर्णोद्धार करवाया। –  महाराणा स्वरूपसिंह ने कन्या वध पर 1844 ई. में तथा सती प्रथा पर 1861 ई. में रोक लगाई। –  इन्होंने डाकन प्रथा (1853 ई.) व समाधि प्रथा पर भी रोक लगाई थी। –  स्वरूप सिंह की मृत्यु 1861 ई. में हुई तथा इनके साथ पासवान ऐंजाबाई सती हुई थी, जो मेवाड़ राज परिवार में सती होने की अन्तिम घटना थी।

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महाराणा सरदार सिंह (1838 – 1842 ई.) || Maharana Saradar Singh

महाराणा सरदार सिंह (1838 – 1842 ई.) Maharana Saradar Singh –  सरदार सिंह बागौर ठिकाने से गोद लिए गए थे। –  इन्होंने जनजातीय उपद्रवों को नियंत्रित करने हेतु 1841 ई. में मेवाड़ भील कोर का गठन किया। इसका मुख्यालय खैरवाड़ा (उदयपुर) में स्थापित किया गया। इसका राजस्थान पुलिस विभाग में 1950 ई. में विलय कर दिया गया।

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महाराणा भीम सिंह (1778 – 1828 ई.) || Maharana Bhim singh

महाराणा भीम सिंह (1778 – 1828 ई.) Maharana Bhim singh –  भीम सिंह ने 13 जनवरी, 1818 ई. को मराठों के भय से अंग्रेजों से संधि कर ली थी। इस संधि पर मेवाड़ की ओर से ठाकुर अजीत सिंह (आसींद, भीलवाड़ा) तथा अंग्रेजों की ओर से चार्ल्स मैटकॉफ ने हस्ताक्षर किए थे। –  भीम सिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी से विवाह के लिए मार्च, 1807 ई.  में जोधपुर के महाराजा मान सिंह एवं जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय के बीच गिंगोली (परबतसर, नागौर) का युद्ध हुआ। इसमें जयसिंह द्वितीय की जीत हुई। –  अमीर खाँ पिण्डारी व अजीत सिंह चुंडावत के सलाह पर कृष्णा कुमारी को जहर दे दिया गया। –  इनके समय फरवरी, 1818

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महाराणा अरि सिंह द्वितीय (1761 – 73 ई.) || Maharana Ari Singh

महाराणा अरि सिंह द्वितीय (1761 – 73 ई.) Maharana Ari Singh –  इनके समय सरदारों ने राजमाता झाली से उत्पन्न पुत्र रतन सिंह को मेवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। –  अरि सिंह ने सिंध और गुजरात से सैनिकों को बुलाकर अपनी सेना में भर्ती किया। –  बूंदी के शासक अजीत सिंह ने शिकार खेलते हुए 9 मार्च 1773 ई. को धोखे से अरि सिंह को मरवा दिया। –  महाराणा अरि सिंह का उत्तराधिकारी हम्मीर द्वितीय (1773-78 ई.)

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महाराणा जगत सिंह द्वितीय (1734 – 1751 ई.) || Maharana Jagat Singh Dvitiy

महाराणा जगत सिंह द्वितीय (1734 – 1751 ई.) Maharana Jagat Singh Dvitiy –  जगत सिंह द्वितीय के समय पेशवा बाजीराव प्रथम मेवाड़ आया था तथा उसने महाराणा के साथ चौथ वसूली का समझौता किया। –  महाराणा जगत सिंह द्वितीय ने माधो सिंह को जयपुर का शासन दिलाने के लिए जयपुर के उत्तराधिकार संघर्ष में हस्तक्षेप किया था। –  इन्होंने पिछोला झील में जगनिवास महलों का निर्माण करवाया। –  इनके दरबारी कवि नेकराम ने जगत विलास नामक ग्रंथ लिखा। –  इन्होंने 17 जुलाई, 1734 को मराठों को राजस्थान से बाहर निकालने के लिए भीलवाड़ा में आयोजित हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता की। यह सम्मेलन अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। –  इनके समय अफगान शासक नादिरशाह ने 1739 ई. में दिल्ली पर आक्रमण किया। –  कर्नल

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महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (1710 – 1734 ई.) Maharana Sangram Singh Dvitiy

महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (1710 – 1734 ई.) Maharana Sangram Singh Dvitiy –  राजस्थान में पहली बार महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय के समय मेवाड़ में मराठों ने प्रवेश किया तथा मेवाड़ से चौथ कर प्राप्त किया। –  इन्होंने मराठों के विरुद्ध राजस्थान के सवाई जयसिंह के साथ मिलकर हुरड़ा सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई। लेकिन दुर्भाग्यवश इस सम्मेलन के आयोजित होने से पूर्व ही इनका

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महाराणा अमर सिंह द्वितीय (1698 – 1710 ई.) || Maharana Amar singh Dvitiy

महाराणा अमर सिंह द्वितीय (1698 – 1710 ई.) Maharana Amar singh Dvitiy –  अमर सिंह द्वितीय के शासनकाल में मेवाड़-मारवाड़-आमेर के मध्य 1708 ई. में देबारी समझौता हुआ। इस समझौते में मेवाड़ के अमर सिंह द्वितीय, मारवाड़ के अजीत सिंह तथा आमेर के सवाई जयसिंह ने भाग लिया। यह समझौता मुगल बादशाह बहादुरशाह प्रथम के विरुद्ध किया गया था। –  अमर सिंह द्वितीय ने अपनी पुत्री इन्द्रकुंवरी का विवाह जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह से करवाया। – 

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