शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने की दिशा में आकलन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है और यह विभिन्न पणधारकों (Stakeholders) की कई प्रकार से सहायता करता है। यह पता लगाकर कि बच्चे कितना सीख रहे हैं, CCE विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों, प्रशिक्षकों, नीति-निर्माताओं आदि को विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। यह विद्यालय या कक्षा स्तर पर पाठ्यचर्या, शिक्षण शास्त्र और शिक्षक की भूमिकाओं को सक्रिय करता एवं जोड़ता है। यह कथागत प्रक्रियाओं को इस प्रकार प्रभावित करता है कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में गुणात्मक सुधार आएँ जिससे प्रत्येक बच्चे को समग्र रूप से सीखने और विकसित होने के पर्याप्त अवसर मिल सकें। “ज्ञान विस्फोट” के इस युग में और “ज्ञान-प्रधान समाज” की निरंतर बदलती आवश्यकताओं के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए, यह आवश्यक है कि वे कौशल प्राप्त किए जाएं जो ‘सीखना’ सिखा सकें। आकलन की प्रक्रिया ऐसी हो जो उच्च कोटि चिंतन के कौशलों को विकसित कर सके। साथ ही आकलन, दिव्यांगताओं, पूर्वाग्रहों व पूर्व-निर्मित धारणाओं से जुड़ी अपनी समस्याओं को सुलझाने का एक प्रभावी साधन है।● आकलन बच्चों की जन्मजात क्षमताओं पर आधारित होना चाहिए।● विद्यालय आधारित आकलन, सीखने की प्रक्रिया को निरंतर बढ़ाते हुए बच्चों को न केवल प्रगति की ओर अग्रसर करता है, अपितु बाहरी परीक्षा के भय को भी दूर करता है। इस संदर्भ में, अप्रैल 2010 से लागू RTE अधिनियम-2009 के अनुसार सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन को एक विद्यालय-आधारित मूल्यांकन प्रणाली के रूप में शुरू किया गया। इस अधिनियम के अनुसार CCE को प्रारम्भिक स्तर तक लागू किया जाना अनिवार्य है। बाहरी परीक्षा की प्रधानता को कम करने के लिए यह अधिनियम प्रत्येक पणधारक विशेषकर शिक्षकों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसलिए यह जरूरी है कि शिक्षक न केवल इसकी सार्थकता को समझे बल्कि हर बच्चे के सम्पूर्ण विकास में इसका भरपूर उपयोग भी करे।● भारत सरकार द्वारा स्थापित शिक्षा आयोग (1964-66) के परीक्षा सुधारों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986 के अनुसार बच्चों के सीखने की प्रगति का आकलन, शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। इसमें उल्लेख किया गया है कि CCE को शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया में इस प्रकार लागू किया जाए जिससे शैक्षिक एवं गैर शैक्षिक पहलुओं को समग्र रूप से देखते हुए स्कूली व्यवस्था में अंकों के स्थान पर ग्रेड द्वारा आकलन करने पर बल दिया जाए। इसमें बाहरी परीक्षा की प्रधानता को कम करने पर तथा स्कूली स्तर पर मूल्यांकन को सरल और कारगर बनाने के लिए कहा गया है।● सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन के ‘सतत्’ से आशय सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के दौरान चलने वाले आकलन से है, जो सत्र के अंत में होने वाले आकलन के साथ-साथ समय रहते यह संकेत दे देता है कि शिक्षण में और सीखने में कहाँ-कहाँ सुधार की जरूरत है। विशिष्ट पाठ्यचर्या के क्षेत्रों के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों को शामिल करते हुए बच्चे के समग्र विकास को ध्यान में रखने को व्यापकता के रूप में देखा जाता है।● CCE की अनुशंसा इसलिए की गई थी कि सीखने की आवश्यकताओं को समझने में आ रही कठिनाइयों की पहचान की प्रक्रिया में संवर्द्धन करने और चिंता एवं तनाव दूर करने में समय रहते समुचित उपाय करने में मदद मिलेगी। इसका यह भी उद्देश्य है कि रटने की प्रवृत्ति को कम किया जाए, शिक्षकों द्वारा अपने शिक्षण पर विचार-विमर्श किया जाए, उसकी समीक्षा की जाए और सुधार किया जाए। सभी बच्चों को उनके सीखने में सुधार के लिए फीडबैक दिया जाए। यह व्यवस्था विशेष आवश्यकता वाले और वंचित वर्गों से संबंध रखने वाले बच्चों के लिए भी लागू है। हालाँकि इस व्यवस्था को संदर्भ के अनुरूप विभिन्न साधनों के द्वारा और अधिक विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है।● अधिगम और आकलन की प्रक्रिया एक-दूसरे से जुड़ी है, उन्हें अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता है। सीखने की प्रकृति(i) सीखना एक सतत् प्रक्रिया है।(ii) सीखना चक्रीय (Spiral) होता है, रैखिक नहीं।(iii) सीखने की समग्र प्रकृति