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भारत का नियंत्रक व महालेखा परीक्षक : भारत का संविधान

भारत का नियंत्रक व महालेखा परीक्षक –     डॉ. अम्बेडकर के अनुसार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भारतीय संविधान के अंतर्गत महत्वपूर्ण पद है। –     भारत में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सार्वजनिक धन का संरक्षक होता है। –     इस पद को वर्ष 1935 के भारत शासन अधिनियम द्वारा ग्रहण किया गया है जहाँ इसको “महालेखा परीक्षक” कहा जाता […]

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न्यायिक पुनरवलोकन : भारत का संविधान

न्यायालय द्वारा कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के कार्यों की वैधता की जाँच करना अर्थात् न्यायालय द्वारा कानूनों तथा प्रशासनिक निर्णयों की संवैधानिकता की जाँच तथा ऐसे कानूनों एवं नीतियों को असंवैधानिक घोषित करना जो संविधान के किसी प्रावधान का अतिक्रमण करती हैं। –     भारत में न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति अमेरिकी संविधान से ग्रहण की गई है। न्यायिक पुनरवलोकन के माध्यम से सरकार के अंगों में शक्ति संतुलन को बनाये रखा जाता है। भारत में न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति उच्चतम तथा उच्च दोनों न्यायालयों के पास हैं। न्यायिक पुनरवलोकन– आशय –     न्यायपालिका, विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों की संवैधानिकता की जाँच करती है। –     कार्यपालिका द्वारा किए गए कार्यों की वैधानिकता का परीक्षण है। विवाद –     कुछ लोगों के अनुसार, न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति सीधे अनुच्छेद-13, (2) से मिलती है। –     जबकि कुछ लोग न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति को संविधान में परोक्ष रूप में निहित मानते हैं। क्योंकि भारतीय शासन व्यवस्था में संविधान सर्वोच्च है। शासन का कोई अंग सर्वोच्च नहीं है। अतः विधि का निर्माण संविधान के अनुरूप होना चाहिए। –     शासन के प्रत्येक अंग पर प्रतिबंध आरोपित हैं, जिसकी जाँच न्यायपालिका द्वारा की जाती है। अतः लिखित संविधान में न्यायिक पुनरवलोकन का सिद्धांत अंतर्निहित होता है। न्यायिक पुनरवलोकन पर प्रतिबंध –     निम्नलिखित का न्यायिक पुनरवलोकन नहीं किया जा सकता है       (i) सांसदों के विशेषाधिकार (अनुच्छेद-105)       (ii) विधायकों के विशेषाधिकार (अनुच्छेद-194)        (iii) निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन।       (iv) मंत्रिपरिषद् द्वारा राष्ट्रपति और राज्यपाल को दी गई सलाह। न्यायिक सक्रियता –     न्यायिक पुनरवलोकन का आरंभ अमेरिका से माना जाता है। अमेरिका में न्यायिक पुनरवलोकन से संबंधित महत्वपूर्ण मामला सन् 1803 का मार्बरी बनाम मेडीसन का है जिसमें न्यायमूर्ति जॉन मार्शल ने न्यायिक पुनरवलोकन की व्याख्या की। वर्तमान में लोकतांत्रिक देशों में न्यायपालिका का लक्ष्य व्यक्तिगत न्याय के साथ सामाजिक न्याय की स्थापना करना है। भारत में न्यायिक सक्रियता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती की है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एस.पी. गुप्ता बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, 1982 के मामले में दिए फैसले ने न्यायिक सक्रियता की संकल्पना को संवैधानिक आधार प्रदान किया। न्यायिक सक्रियता क्या है? –     न्यायपालिका संवैधानिक प्रणाली के तहत संवैधानिक मूल्यों और नैतिकता को बनाए रखने के लिये सक्रिय भूमिका निभाती है। –     नागरिक दुविधाओं को संबोधित करने और कानूनों के सकारात्मक और मानक पहलूओं के बीच अंतर को भरने के लिये न्यायपालिका अपने स्वविवेक और रचनात्मकता का प्रयोग कर न्याय निर्गमन करती है परिणामतः न्यायिक सक्रियता का उद्भव होता है। –     ‘न्यायिक सक्रियता’ शब्द न्यायाधीशों के निर्णय को संदर्भित करता है। न्यायिक समीक्षा को एक सिद्धांत के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसके तहत न्यायपालिका द्वारा विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा की जाती है। –     उल्लेखनीय है कि न्यायिक समीक्षा को विधायी कार्यों की समीक्षा, न्यायिक फैसलों की समीक्षा और प्रशासनिक कार्रवाई की समीक्षा के तीन आधारों पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। –     न्यायालय, न्यायिक समीक्षा द्वारा कार्यपालिका और विधायिका दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं। न्यायिक सक्रियता के पक्ष में तर्क –     न्यायिक सक्रियता न्यायाधीशों को उन मामलों में अपने व्यक्तिगत ज्ञान का उपयोग करने का अवसर प्रदान करती है जहाँ कानून संतुलन प्रदान करने में विफल रहा। –     कई बार सार्वजनिक शक्ति लोगों को नुकसान पहुँचाती है, इसलिए न्यायपालिका के लिये सार्वजनिक शक्ति के दुरुपयोग को जाँचना आवश्यक हो जाता है। –     यह अन्य सरकारी शाखाओं में चेक और शेष राशि की एक प्रणाली प्रदान करती है। न्यायिक सक्रियता रचनात्मकता से युक्त एक नाजुक अभ्यास है। यह न्याय-निर्णयन में आवश्यक नवाचार लाती है। –     इसके अतिरिक्त न्यायिक सक्रियता भी मुद्दों में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है, यही कारण है कि यह स्थापित न्याय प्रणाली और उसके निर्णयों में त्वरित विश्वास कायम करती है। –     यह तेज़ी से उन विभिन्न मुद्दों पर समाधान प्रदान करने का एक अच्छा विकल्प है, जहाँ विधायिका बहुमत के मुद्दे पर फँस जाती है। न्यायिक सक्रियता के विपक्ष में तर्क –     अदालतों के बार-बार हस्तक्षेप के कारण लोगों का विश्वास सरकारी संस्थानों की गुणवत्ता, अखंडता और दक्षता के प्रति कम हो जाता है। –     न्यायाधीश किसी भी मौजूदा कानून को ओवरराइड कर सकते हैं। इसलिए यह स्पष्ट रूप से संविधान द्वारा तैयार की गई सीमा रेखा का उल्लंघन करता है। –     न्यायाधीशों की न्यायिक राय अन्य मामलों पर शासन करने के लिये मानक बन जाती है। इसके अतिरिक्त निर्णय निजी या स्वार्थी उद्देश्यों से प्रेरित हो सकते हैं जो जनता को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचा सकते हैं।  जनहित याचिका –     जनहित याचिका की अवधारणा अमेरिका से ली गई है। इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी व्यक्ति या सामाजिक संगठन किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूहों के अधिकार दिलाने के लिए न्यायालय जा सकता है। लोकहित वाद की उत्पत्ति अनुच्छेद-226 के तहत हुई है। जनहित वाद सार्वजनिक हित से जुड़े हुए वाद हैं जिनमें समाज के शोषित, निर्धन व असहाय लोगों के हितों की रक्षा की जाती है। भारत में लोकहित वाद न्यायिक सक्रियता का लक्षण है। जनहित वाद संविधान के अनुच्छेद-39A में अंतर्निहित सामाजिक न्याय के उद्देश्य की प्राप्ति में सहायक महत्वपूर्ण उपकरण है। हुसैन आरा खातून बनाम बिहार राज्य से प्रथम जनहित याचिका की शुरुआत हुई है, लेकिन एस.पी. गुप्ता बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया-1982 मामले में इसे आधिकारिक मान्यता दी गई। –     एस.पी. गुप्ता अन्य बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया-1982 केस को न्यायाधीशों का मुकदमा कहा जाता है। जनहित वाद अथवा लोकहित वाद के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर और न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने निभाई। जनहित याचिका (PIL)- आशय –     जनहित याचिका को सामाजिक हित याचिका तथा पत्र अधिकारिता भी कहा जाता है। जनहित याचिका के द्वारा वादी-प्रतिवादी न्याय की संकल्पना को बदल दिया गया। –     समूह के अधिकारों की रक्षा के लिए तीसरा व्यक्ति भी न्यायपालिका में जा सकता है। –

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उच्चतम न्यायालय  : भारत का संविधान

उच्चतम न्यायालय  उच्चतम न्यायालय मूल अधिकारों एवं संविधान का संरक्षक है। ऑस्टिन के अनुसार, ″यह सामाजिक क्रांति का संरक्षक है।″ अल्लादि कृष्णा स्वामी अय्यर के अनुसार, ″यह एक महान अधिकरण (Tribunal) है, जिसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं सामाजिक नियंत्रण बीच एक रेखा खींचनी होती है। यह देश में कानून का अंतिम और सर्वोच्च व्याख्याकार है। यह

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संघीय विधायिका : भारत का संविधान

संघीय विधायिका भारत संविधान में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाया गया है, जिसे सरकार का वेस्मिंस्टर मॉडल भी कहा जाता है। संसदीय लोकतंत्र में संसद के सामान्यत: तीन लक्षण होते हैं, प्रथम – यह जनता का प्रतिनिधित्व करती है, द्वितीय – इसमें उत्तरदायित्वपूर्ण सरकार होती है तथा तृतीय – मंत्रिपरिषद् लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती

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प्रधानमंत्री : भारत का संविधान

प्रधानमंत्री –  भारत में संसदीय व्यवस्था अपनाई गई है, जिसमें राष्ट्रपति केवल नाममात्र का कार्यकारी प्रमुख होता है तथा वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ प्रधानमंत्री में निहित होती हैं। –  प्रधानमंत्री सहित सभी प्रकार के मंत्रियों के समूह को मंत्रिपरिषद् कहा जाता है। –  संविधान के अनुच्छेद-74(1) के अनुसार, ‘राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने के लिए

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केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् : भारत का संविधान

केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् –  प्रधानमंत्री सहित सभी प्रकार के मंत्रियों के समूह को मंत्रिपरिषद् कहा जाता है। –  मंत्री तीन प्रकार के होते हैं– (i) कैबिनेट मंत्री, (ii) राज्यमंत्री, (iii) उपमंत्री। –  संविधान के अनुच्छेद-74 के अनुसार राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद् होती है। –  राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् के परामर्श अनुसार कार्य

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उपराष्ट्रपति : भारत का संविधान

उपराष्ट्रपति –  भारतीय संविधान के अन्तर्गत पदानुक्रम में राष्ट्रपति के बाद उपराष्ट्रपति का दूसरा स्थान है। –  संविधान के अनुच्छेद-63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा। –  अनुच्छेद-64 के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। यह राज्यसभा के अधिवेशनों की अध्यक्षता करता है। –  भारत में उपराष्ट्रपति के पद संबंधी प्रावधान अमेरिका के संविधान से लिए

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प्रमुख संविधान संशोधन : भारत का संविधान

प्रमुख संविधान संशोधन  –  संविधान के भाग XX के अनुच्छेद-368 में संसद को संविधान एवं इसकी व्यवस्था में संशोधन की शक्ति का उल्लेख है। इसमें यह प्रावधान है कि संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग, करते हुए इस संविधान के किसी उपबंध का परिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन कर सकती है। हालाँकि संसद उन

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मूल कर्तव्य : भारत का संविधान

मूल कर्तव्य पृष्ठभूमि –  मूल कर्तव्य का उल्लेख, मूल संविधान में नहीं था। दुनिया के अधिकांश उदारवादी लोकतांत्रिक देशों के संविधान में मूल कर्तव्यों का उल्लेख नहीं है। – भारत के संविधान में मूल कर्तव्य सोवियत संघ रूस के संविधान से प्रेरित है। संविधान में उल्लेख – भारत में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा

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राज्य की नीति निदेशक तत्त्व : भारत का संविधान Directive Principles of State Policy

राज्य की नीति निदेशक तत्त्व Directive Principles of State Policy पृष्ठभूमि –  किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण में मौलिक अधिकार तथा नीति निर्देश महत्वर्ण भूमिका निभाते हैं। राज्य के नीति निदेशक तत्त्व जनतांत्रिक संवैधानिक विकास के नवीनतम तत्त्व हैं। –  सर्वप्रथम ये आयरलैंड के संविधान में लागू किये गये थे। ये वे तत्त्व है

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