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भटनेर दुर्ग हनुमानगढ़

  • भाटियों की वीरता और पराक्रम का साक्षी भटनेर का दुर्ग हनुमानगढ़ जिले में अवस्थित है।
  • घग्घर नदी के मुहाने पर बसे इस प्राचीन दुर्ग को उत्तरी सीमा का प्रहरी कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
  • मध्य एशिया, सिन्ध व काबुल के व्यापारी मुल्तान से भटनेर होते हुए दिल्ली व आगरा आते-जाते थे।
  • दिल्ली-मुल्तान मार्ग पर स्थित होने के कारण भटनेर का बड़ा सामरिक महत्व था।
  • मरुस्थल से घिरा होने के कारण भटनेर के किले को शास्त्रों में वर्णित धान्वनदुर्ग की कोटि में रख सकते हैं।
  • इस प्राचीन किले का निर्माण भाटी राजा भूपत ने करवाया था, जो गजनी के सुल्तान से हारकर जंगलों में भाग गये थे।
  • महमूद गजनवी ने विक्रम संवत् 1058 (1001 ई.) में भटनेर पर अधिकार कर लिया था।
  • बलबन के चचरे भाई शेरखां ने इस दुर्ग की मरम्मत करवाई थी जिसकी मृत्यु भी यहां हुई। उसकी कब्र आज भी किले के भीतर विद्यमान है।
  • बीकानेर के चौथे राजा जैतसिंह ने 1527 ई. में भटनेर पर आक्रमण कर वहां के अधिपति नादा चायल को पराजित कर भटनेर पर पहली बार राठौड़ों का आधिपत्य स्थापित हुआ। उसने राव कांधल के पुत्र खेतसी को वहां का दुर्गाध्यक्ष नियुक्त किया।
  • दयालदास री ख्यात में भटनेर के किले से सम्बंधित एक घटना का उल्लेख है। 1597 ई. में एक बार अकबर का ससुर नसीर खाँ भटनेर में आकर ठहरा। उसने वहां किसी महिला सेविका के साथ छेड़छाड़ की तो रायसिंह के इशारे पर उसके सेवक तेजा ने नसीर खाँ की पिटाई कर दी। नसीर खाँ ने इसकी शिकायत अकबर से की। तब अकबर ने नाराज होकर रायसिंह को भला-बुरा कहा।
  • बीकानेर के महाराजा सूरतसिंह के शासनकाल में 1805 ई. में पांच महीने के घेरे के बाद राठौड़ों ने जाब्ता खाँ भट्टी से भटनेर ले लिया और इस प्राचीन दुर्ग पर बीकानेर का अधिकार हो गया। महाराजा सूरतसिंह द्वारा मंगलवार के दिन दुर्ग हस्तगत किये जाने के कारण भटनेर का नाम हनुमानगढ़ रख दिया गया तथा इस उपलक्ष्य में किले में हनुमान जी के मंदिर का भी निर्माण करवाया गया।
  • इस किले के प्रवेश द्वार पर एक राजा के साथ छः स्त्री आकृतियाँ बनी हैं। यह राजा दलपतसिंह एवं उनकी रानियों की है।
  • ठाकुरसी के पुत्र बाघा ने भटनेर में गोरखनाथ मंदिर का निर्माण कराया।
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