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तारागढ़ – अजमेर || Taaragarh Ajmer

तारागढ़ – अजमेर

  • अरावली पर्वतमाला के एक ऊँचे शिखर पर अवस्थित अजमेर का तारागढ़ पूर्वी राजस्थान के प्राचीन एवं प्रमुख किलों में गिना जाता है। 
  • शिलालेखों एवं इतिहास ग्रन्थों में इसे तारागढ़, अजयमेरु तथा गढ़ बीठली आदि नामों से जाना जाता है। 
  • यह राजस्थान का प्राचीन गिरि दुर्ग है। 
  • प्राचीन दुर्गों में तारागढ़ अपनी प्राचीरों और सुदृढ़ बुर्जो के लिए प्रसिद्ध था। इसकी रचना से प्रभावित होकर बिशप हैबर ने इसे पूर्व का दूसरा जिब्राल्टर कहा था। 
  • इस दुर्ग का निर्माण सातवीं शताब्दी में शाकंभरी के चौहान नरेशों ने अरब खलीफाओं के आक्रमणों से बचने के लिए कराया था। 
  • कर्नल टॉड ने इस दुर्ग को चौहान राजा अजयपाल द्वारा निर्मित माना है। 
  • अजमेर के संस्थापक राजा अजयपाल ने इस दुर्ग को निर्मित कराया, उनके नाम पर अजयमेरु या अजयगढ़ पड़ा।
  • मुगल बादशाह शाहजहाँ के सेनाध्यक्ष विट्ठलदास ने इस दुर्ग का पुनर्निर्माण कराया, इसलिए इस दुर्ग को गढ़ बीठली कहा जाने लगा, परन्तु अब ये तारागढ़ के नाम से जाना जाता है। 
  • शाहजहां का बड़ा शहजादा दारा शिकोह इसी दुर्ग में जन्मा था। 
  • इस दुर्ग में हजरत मीरा सैयद हुसैन खिगसवार और ख्वाजा वज्हीउद्दीन मशहवी की दरगाह उल्लेखनीय है।
  • इस दुर्ग का मुख्य दरवाजा विजयपोल है तथा अन्य दरवाजे लक्ष्मीपोल, फूटा दरवाजा, बड़ा दरवाजा, भवानीपोल, हाथी व अरकोट आदि है। 
  • दुर्ग के तारागढ़ नामकरण के बारे में डा. गोपीनाथ शर्मा की मान्यता है कि मेवाड़ के राणा रायमल के युवराज (राणा सांगा के भाई) पृथ्वीराज ने इस दुर्ग के कुछ भाग बनवाये और अपनी वीरांगना पत्नी तारा के नाम पर इसका तारागढ़ नाम रखा।
  • इस दुर्ग का नाम ‘गढ़ बीठली’ पड़ा यह किसी पराक्रमी योद्धा के नाम के आधार पर ही पड़ा। प्रसिद्ध दोहा – 
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बाँको है गढ़ बीठली, बाँको भड़ बीसल्ल। 

खाग खेंचतो खेत मझ, दलभलतो अरिदल्ल।। 

  • तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में पराक्रमी पृथ्वीराज चौहान तृतीय की पराजय के बाद तारागढ़ पर मुहम्मद गौरी ने अधिकार कर लिया। 
  • मारवाड़ के राजा मालदेव का भी इस दुर्ग पर अधिकार रहा था उन्होंने इस दुर्ग का जीर्णोद्वार करवाया था। इनकी रूठी रानी (उमा दे) यही रहती थी। वह महल ‘रूठी रानी का महल कहलाता हैं।‘
  • तारागढ़ की प्राचीर में 14 विशाल बुर्जे है जिनमें प्रमुख घूंघट गूगड़ी तथा फूटी बुर्ज, नक्कारची की बुर्ज, शृंगार-चंवरी बुर्ज, आरपार का अत्ता, जानू नायक की बुर्ज, पीपली बुर्ज, इब्राहीम शहीद की बुर्ज, दोराई बुर्ज, बांदरा बुर्ज, इमली बुर्ज, खिड़की बुर्ज और फतेह बुर्ज आदि है। 
  • तारागढ़ के भीतर ऊँचाई पर प्रसिद्ध मुस्लिम संत मीरा साहेब की दरगाह है। तथा किले के भीतर पाँच बड़े जलाशय है, जिनमें नाना साहब का झालरा, गोल झालरा, इब्राहीम का झालरा और बड़ा झालरा उल्लेखनीय है।
  • तारागढ़ अतीत की एक अनमोल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है, जिसके बारे में एक दोहा प्रसिद्ध है –

गौड़ पंवार सिसोदिया, चहुवाणां चितचोर। 

तारागढ़ अजमेर रो, गरवीजै गढ़ जोर।।

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