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रणथम्भौर के चौहान का इतिहास History of Ranthambhour

रणथम्भौर के चौहान का इतिहास History of Ranthambhour

  • 13 वीं शताब्दी में यहाँ पर चौहान वंश का शासन था।
  • पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र गोविन्द राज ने यहाँ पर तराइन के द्वितीय युद्ध के पश्चात चौहान वंश की स्थापना की।
  • यहाँ के शासक वीरनारायण ने दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश के रणथम्भौर पर हुए आक्रमण को विफल कर दिया लेकिन इल्तुतमिश ने दिल्ली में इसका वध करवा दिया।
  • वागभट्ट ने पुन: रणथम्भौर दुर्ग पर अधिकार कर पुन: यहाँ चौहान वंश का शासन स्थापित किया।

हम्मीर देव (1282 . – 1301 .)

  • रणथम्भौर का सर्वाधिक प्रतापी शासक हम्मीर देव चौहान हुआ जो 1282 ई. में यहाँ का शासक बना।
  • हम्मीर देव के शासनकाल के बारे में जानकारी कवि जोधराज द्वारा रचित ‘हम्मीर रासो’, नयनचन्द्र सूरी द्वारा रचित ‘हम्मीर महाकाव्य’ व ‘सुर्जन चरित’ ,चन्द्रशेखर द्वारा रचित ‘हम्मीर हठ’ तथा व्यास भाँडउ द्वारा रचित ‘हम्मीरायण’ आदि ग्रन्थों से मिलती है।
  • अमीर खुसरो तथा जियाउद्दीन बरनी द्वारा रचित ग्रंथों से भी यहाँ की तत्कालीन स्थितियों के बारे में जानकारी मिलती है।
  • हम्मीर देव ने शासक बनने के बाद सर्वप्रथम भीमरस के शासक अर्जुन को परास्त कर माण्डलगढ़ को अपने अधीन किया तथा परमार शासक भोज को भी पराजित किया।
  • हम्मीर देव ने मेवाड़ के शासक समरसिंह को भी परास्त कर अपना राज्य विस्तार किया।
  • दिल्ली शासक जलालुद्दीन खिलजी ने हम्मीर देव की विजयों से चिन्तित होकर 1290 ई. में रणथम्भौर पर आक्रमण कर झाँइन के दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
  • इसके बाद जलालुद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर दुर्ग को अपने अधीन करने के लिए कई प्रयास किये लेकिन सफल नहीं हो सका तथा वापस दिल्ली लौट गया।
  • जलालुद्दीन के दिल्ली लौटने के बाद हम्मीर देव ने झाँइन दुर्ग पर पुन: अधिकार कर लिया।
  • जलालुद्दीन ने 1292 ई. में पुन: रणथम्भौर पर अधिकार करने के लिए एक असफल प्रयास किया तथा सफलता न मिलने पर जलालुद्दीन ने कहा कि ‘ऐसे दस दुर्गों को भी मैं मुसलमान के एक बाल के बराबर भी महत्व नहीं देता’।
  • 1296 ई. में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का शासक बना तथा 1299 ई. में अलाउद्दीन ने अपने सेनानायक उलूग खाँ तथा नुसरत खाँ के नेतृत्व में रणथम्भौर पर आक्रमण के लिए विशाल सेना भेजी जिसने झाँइन दुर्ग पर अधिकार किया।
  • हम्मीर देव ने इस सेना से मुकाबला करने के लिए अपने सेनानायक भीमसिंह एवं धर्मसिंह के नेतृत्व में सेना भेजी।
  • इस संघर्ष में हम्मीर देव के सेनानायक भीमसिंह वीरगति को प्राप्त हुए तथा शेष सेना वापस रणथम्भौर लौट गई।
  • इस संघर्ष में नुसरत खाँ के मारे जाने के बाद अलाउद्दीन स्वयं सेना लेकर रणथम्भौर आया तथा हम्मीर देव के सेनानायक रतिपाल तथा रणमल को प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया।
  • हम्मीर देव तथा अलाउद्दीन के मध्य हुए युद्ध में हम्मीर देव तथा इसके कई सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए तथा इसकी रानी रंगदेवी ने अन्य वीरांगनाओं के साथ जौहर किया।
  • 1301 ई. में रणथम्भौर पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया।
  • रणथम्भौर का यह युद्ध राजस्थान का पहला साका माना जाता है।
  • इस युद्ध में मुस्लिम इतिहासकार हम्मीर खुसरो भी उपस्थित था तथा इस बारे में उसने लिखा कि ‘आज कुफ्र का घर इस्लाम का घर हो गया’।
  • रणथम्भौर दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी द्वारा आक्रमण के प्रमुख कारण अलाउद्दीन खिलजी का महत्वकांक्षी होना, हम्मीर देव द्वारा राजकर न देना तथा अलाउद्दीन के विद्रोही सेनानायक मुहम्मदशाह को हम्मीर देव द्वारा शरण देना आदि थे।
  • हम्मीर देव एक महान यौद्धा एवं सेनानायक था जिसने कुल लड़े गये 17 युद्धों में से 16 युद्धों में विजय प्राप्त की थी।
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