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रतन सिंह (1302 – 1303 ई.) || Ratan singh

  • – रतन सिंह ने सिंहल द्वीप (श्रीलंका) के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की पुत्री पद्मिनी से विवाह किया।
  • – पद्मिनी का प्रिय तोता ‘हीरामन’ था।
  • –  इनके बारे में जानकारी का प्रमुख स्रोत 1540 ई. की मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा मसनवी शैली में रचित अवधी भाषा का प्रसिद्ध ग्रन्थ पद्मावत है। इस ग्रंथ में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण का कारण पद्मिनी को प्राप्त करना बताया गया है।
  • –  ‘पद्मावत’ पुस्तक के विषय वस्तु को सूर्यमल्ल मिश्रण ने स्वीकार नहीं किया, जबकि मुहणोत नैणसी तथा जेम्स टॉड ने इसे स्वीकार किया है।
  • – तांत्रिक राघव चेतन ने अलाउद्दीन को पद्मिनी के सौंदर्य की जानकारी दी थी।
  • –  खजाइन-उल-फुतुह पुस्तक से अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ आक्रमण की जानकारी मिलती है।
  • – 28 जनवरी, 1303 ई. को अलाउद्दीन दिल्ली से चित्तौड़ के लिए ससैन्य रवाना हुआ तथा 26 अगस्त, 1303 ई. को चित्तौड़ पर अधिकार किया। इस समय चित्तौड़ का प्रथम और राजस्थान का दूसरा साका हुआ, जिसमें केसरिया का नेतृत्व रावल रतन सिंह ने किया तथा रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ जौहर कर लिया।
  • – इस संघर्ष में दो मेवाड़ी सरदार गोरा और बादल’ वीरगति को प्राप्त हुए । रतन सिंह के सेनापति गोरा और बादल क्रमशः पद्मिनी के काका व भाई थे।
  • –  ‘गोरा बादल पद्मिनी चौपाई’ की रचना हेमरत्न सूरी ने किया।
  • – चित्तौड़ पर विजय प्राप्त करने के बाद अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्र खाँ’ को चित्तौड़ का प्रशासक नियुक्त किया तथा चित्तौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद’ कर दिया था। खिज्र खाँ ने गंभीरी नदी पर पुल का निर्माण करवाया।
  • – युद्ध में विजय के बाद खिज्र खाँ ने चित्तौड़गढ़ की तलहटी में एक मकबरा बनवाया, जिसमें 1310 ई. का फारसी भाषा का शिलालेख लगा है। इसमें अलाउद्दीन खिलजी को दूसरा सिकंदर, ईश्वर की छाया और संसार का रक्षक बताया गया है।
  • – जालोर का मालदेव सोनगरा अलाउद्दीन की 1316 ई. में मृत्यु के बाद 1316 ई. से 1326 ई. तक चित्तौड़ का प्रशासक रहा। इसे ‘मुँछाला मालदेव’ भी कहा जाता था।
  • –  अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ आक्रमण के समय इतिहासकार अमीर खुसरो उसके साथ था।
  • – अलाउद्दीन द्वारा चित्तौड़ पर विजय प्राप्त करने के बाद 30,000 से अधिक आम नागरिकों का कत्लेआम किया गया, जिसका उल्लेख अमीर खुसरो ने किया है।
  • –  रतन सिंह रावल शाखा का अंतिम शासक था। यह रावल उपाधि धारण करने वाला मेवाड़ का अन्तिम शासक था।

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