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निवार्चन आयोग : भारत का संविधान

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निवार्चन आयोग

–     किसी भी लोकतान्त्रिक प्रणाली में चुनाव उस प्रणाली को सुचारू रूप से शुरू रखने के लिए अति-आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान में सरकार के अंगों का विशिष्ट वर्णन किया गया तथा अनेक प्रशासनिक संस्थाओं की स्थापना भी की गई।

–     भारत के संविधान के भाग-15 के अनुच्छेद-324 के अंतर्गत भारत में चुनाव आयोग का प्रावधान है। इसी के साथ संविधान ने संसद को यह शक्ति प्रदान की है, कि वह समय-समय पर ऐसे प्रावधानों का निर्माण करें, जिसके द्वारा चुनाव आयोग भारत में चुनाव संपन्न करा सके। संविधान निर्माताओं ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र एवं स्वायत्त बनाने के लिए प्रावधान किया है।

संविधान में चुनावों से संबंधित अनुच्छेद

–     324-चुनाव आयोग में चुनावों के लिये निहित दायित्व- अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण।

–     325-धर्म, जाति या लिंग के आधार पर किसी भी व्यक्ति विशेष को मतदाता सूची में शामिल न करने और इनके आधार पर मतदान के लिये अयोग्य नहीं ठहराने का प्रावधान।

–     326-लोकसभा एवं प्रत्येक राज्य की विधानसभा के लिये निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा।

–     327-विधायिका द्वारा चुनाव के संबंध में संसद में कानून बनाने की शक्ति।

–     328-किसी राज्य के विधानमंडल को इसके चुनाव के लिये कानून बनाने की शक्ति।

–     329-चुनावी मामलों में अदालतों द्वारा हस्तक्षेप करने के लिये बार (BAR)

केन्द्रीय निर्वाचन आयोग की स्थापना

–     भारत के निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को की गयी थी। इस दिन को भारत में राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

संरचना

–     मूल भारतीय संविधान में एक सदस्यीय चुनाव आयोग का प्रावधान था और प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन थे।

–     राष्ट्रपति की एक अधिसूचना के ज़रिये 16 अक्तूबर, 1989 को इसे तीन सदस्यीय बना दिया गया। इसके बाद कुछ समय के लिये इसे एक सदस्यीय आयोग बना दिया गया और 1 अक्टूबर, 1993 को इसका तीन सदस्यीय आयोग वाला स्वरूप फिर से बहाल कर दिया गया। तब से निर्वाचन आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं।

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–     इनके वेतन-भत्ते, कार्यकाल, स्थिति आदि मुख्य चुनाव आयुक्त के समान होते हैं तथा इनकी बैठकों की अध्यक्षता मुख्य निर्वाचन आयुक्त करता है।

नियुक्ति

–     भारत का मुख्य निर्वाचन अधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा की रैंक का अधिकारी होता है|

–     इसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है तथा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति ही करता है।

कार्यकाल

–     इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (दोनों में से जो भी पहले हो) तक होता है।

त्यागपत्र

–     ये अपना त्यागपत्र भारत के राष्ट्रपति को संबोधित करते हैं।

पद से हटाया जाना

–     मुख्य चुनाव आयुक्त को दुर्व्यवहार या पद के दुरुपयोग का आरोप सिद्ध होने पर या अक्षमता के आधार पर संसद द्वारा अपनाए गए प्रस्ताव के माध्यम से ही पद से हटाया जा सकता है। इसको उच्चतम और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को जिस प्रकार हटाया जाता है उसी प्रकार हटाया जाता है।

–     अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त के परामर्श पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाता है।

वेतन एवं भत्ते

–     इन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समकक्ष दर्जा प्राप्त होता है और उसके समान वेतन एवं भत्ते मिलते हैं।

–     इनकी सेवा-शर्तों का निर्धारण राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।

चुनाव आयोग के कार्य

      भारत में चुनाव आयोग का मूल कार्य निम्नलिखित हैं-

1.   चुनाव का निरीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण करना।

2.   मतदाता सूची का निर्माण, उसमें परिवर्तन एवं संशोधन करना।

3.   जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 के अनुसार, सीटों का वितरण करना, चुनाव परिसीमन में सहायता देना तथा संसदीय तथा विधायिकाओं चुनाव के लिए मतदाता सूची का निर्माण एवं संशोधन करना।

4.   जन प्रतिनिधित्व अधिनियम – 1950 के अनुसार, चुनाव व्यवहारों की जाँच करना तथा चुनाव के बाद के विवादों का समाधान करना।

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5.   मतदान एवं मतगणना केंद्रों के लिये स्थान, मतदाताओं के लिये मतदान केंद्र तय करना, मतदान एवं मतगणना केंद्रों में सभी प्रकार की आवश्यक व्यवस्थाएँ और अन्य संबद्ध कार्यों का प्रबंधन करता है।

6.   यह राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करता है।

7.   चुनाव में ‘आदर्श आचार संहिता’ जारी करता है।

8.   संसद सदस्यों की निर्योग्यता के संबंध में राष्ट्रपति को परामर्श प्रदान करता है व राज्य विधानमंडल के संदर्भ में राज्यपाल को सलाह प्रदान करता है।

चुनाव आयोग की कमियाँ या दोष या आलोचना

1.   निर्वाचन आयुक्त की योग्यता का उल्लेख नहीं किया जाना आयुक्त के संदर्भ में नियुक्ति को अस्पष्ट करता है।

2.   निर्वाचन आयोग की चुनावों के समय राज्य सरकार के कर्मचारियों पर निर्भरता होना चुनाव आयोग को सरकार पर निर्भर करता है।

3.   समय पर चुनाव आयोग द्वारा निर्वाचन याचिकाओं की सुनवाई नहीं किया जाना व चुनाव आयोग पर कार्य का भार अधिक होना।

4.   चुनाव में होने वाले घोटालों को न रोक पाना और चुनाव आयोग पर केंद्र सरकार के इशारों के अनुसार काम करने का आरोप लगना।

5.   मुख्य चनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों का सेवा समाप्ति बाद अन्य पद धारण किया जाना।

 चुनाव आयोग के संदर्भ में सुझाव-

1.   निर्वाचन आयोग में भूतपूर्व न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाये।

2.   निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर की जाये।

3.   निर्वाचन याचिकाओं की सुनवाई के लिए विशेष पीठों का गठन किया जाये।

4.   निर्वाचन आयोग की सदस्य संख्या का विस्तार किया जाये।

5.   मुख्य चनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों का सेवा समाप्ति बाद अन्य पद धारण किये जाने पर रोक लगाई जाये।

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महत्त्व

–     चुनाव आयोग, भारतीय लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका के बाद महत्वपूर्ण संस्था है।

–     लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की लोकतांत्रिक इच्छाओं को विधि सम्मत बनाने के लिए चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है। अतः चुनाव आयोग के द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों को संस्थागत किया जाता है। जिससे लोकतंत्र का प्रकार्य आसान हो सके।

–     समकालीन गठबंधन सरकारों के युग में चुनाव आयोग की भूमिका में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अधिकांश दल जाति धर्म जैसे संकीर्ण मुद्दों के आधार पर लोकतंत्र में विजय प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अतः व्यक्तियों एवं दलों को नियंत्रित करने में चुनाव आयोग की भूमिका निर्णायक है।

चुनाव सुधार हेतु गठित प्रमुख समितियाँ

1.   वी.एन. तारकुण्डे समिति (1980) :-

      (i) इस समिति ने सिफारिश की कि मताधिकार की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया जाए।

      (ii) राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना की जाए।

      (iii) चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय बनाया जाए।

      (iv) उम्मीदवारों के व्यय का लेखा-जोखा रखा जाए।

      (v) रेडियो और दूरदर्शन पर प्रचार हेतु समय दिया जाए।

2.   दिनेश गोस्वामी समिति (1990) :-

      (i) इस समिति ने ई.वी.एम. मशीन द्वारा मतदान सम्पन्न करवाये जाने का सुझाव दिया।

      (ii) लोकसभा में सरकारी निधियन

      (iii) मतदाताओं को फोटो युक्त परिचय पत्र उपलब्ध करवाने का सुझाव दिया।

      (iv) लोक प्रतिनिधियों के रिक्त स्थानों को 6 माह के भीतर भरे जाने का सुझाव दिया।

3.   के. संथानम समिति (1990) :-

      (i) इस समिति ने उम्मीदवारों के न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता हेतु सुझाव दिया।

वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त व सदस्य –

अध्यक्ष – श्री सुशील चंद्रा (13 अप्रैल, 2021 को नियुक्त)

सदस्य –   श्री राजीव कुमार (1 सितंबर, 2020 को नियुक्त)

सदस्य – श्री अनूप चंद्र पाण्डेय (09 जुन, 2021 को नियुक्त)

भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्तों की सूची –

नामकार्यकाल
सुकुमार सेन21 मार्च, 1950 – 19 दिसंबर, 1958
के. वी. के. सुंदरम20 दिसंबर, 1958 – 30 सितंबर, 1967
एस. पी. सेन वर्मा01 अक्टूबर, 1967 – 30 सितंबर, 1972
डॉ. नागेंद्र सिंह01 अक्टूबर, 1972 – 6 फरवरी, 1973
टी. स्वामीनाथन07 फरवरी, 1973 – 17 जून, 1977
एस.एल. शकधर18 जून, 1977 – 17 जून, 1982
आर.के. त्रिवेदी18 जून, 1982 – 31 दिसंबर, 1985
आर.वी. एस. पेरिशास्त्री01 जनवरी, 1986 – 25 नवंबर, 1990
श्रीमती वी.एस. रमा देवी26 नवंबर, 1990 – 11 दिसंबर, 1990
टी.एन. शेषन12 दिसंबर, 1990 – 11 दिसंबर, 1996
एम.एस. गिल12 दिसंबर, 1996 – 13 जून, 2001
जे.एम. लिंगदोह14 जून, 2001 – 7 फरवरी, 2004
टी.एस. कृष्णमूर्ति08 फरवरी, 2004 – 15 मई, 2005
बी. बी. टंडन16 मई, 2005 – 29 जून, 2006
एन. गोपालस्वामी30 जून, 2006 – 20 अप्रैल, 2009
नवीन चावला21 अप्रैल, 2009 – 29 जुलाई, 2010
एस. वाई. कुरैशी30 जुलाई, 2010 – 10 जून, 2012
वी. एस संपत11 जून, 2012 – 15 जनवरी, 2015
एच. एस. ब्राह्मा16 जनवरी, 2015 – 18 अप्रैल, 2015
डॉ. नसीम जैदी19 अप्रैल, 2015 – 05 जुलाई, 2017
श्री ए.के. जोति06 जुलाई, 2017 – 22 जनवरी, 2018
श्री ओम प्रकाश रावत23 जनवरी, 2018 – 01 दिसंबर, 2018
श्री सुनील अरोड़ा02 दिसंबर, 2018 – 12 अप्रैल, 2021
श्री सुशील चंद्रा13 अप्रैल, 2021 – अब तक

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